Saturday, 12 August 2017

जापानी बुखार ने फिर पांव पसारे भारत में

जापानी बुखार के नाम से मशहूर जापानी इन्सेफेलाइटिस एक जानलेवा बीमारी है। पिछले कुछ सालों से जापानी बुखार ने भारत में खूब कहर मचाया है गोरखपुर में पिछले 5 दिनों में 60 बच्चों की मौतों से पूरा देश सहमा हुआ है जापानी बुखार हर साल देश में हजारों लोगों की मौत का कारण बनता है। इसलिए इसके बारे में सही जानकारी और बचाव बेहद जरूरी है। तो चलिये आज आपको जापानी इन्सेफेलाइटिस के बारे में बताते है कि आखिर इन्सेफेलाइटिस क्या है और इसके बचाव और पहचाने के क्या उपाय हैं..?


क्या है जापानी बुखार

सर्वप्रथम 1871 में इस बीमारी का पता जापान में चला था, इसलिए इसका नाम पनीईज इन्सेफेलाइटिस यानि की जापानी बुखार पडा। जापानी बुखार से विश्व में प्रतिवर्ष 68 हजार लोग संक्रमित होते है, जिसमें से 20 हजार लोगों की मृत्यु हो जाती है। एशिया महाद्वीप के 14 देश इस बीमारी से प्रभावित है, जिसमे चीन और भारत भी शामिल है।                                                                           

जापानी बुखार का भारत में बढ़ता प्रकोप

भारत मे सर्वप्रथम 1955 में तमिलनाडु में इस बीमारी का पता चला था। भारत के 19 राज्यों के 171 जिल जापानी बुखार से प्रभावित है। वर्तमान में यह बीमारी पूर्वी उत्तरप्रदेश में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है और गोरखपुर जिला इस बीमारी का केन्द्र बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर साल 500-600 सौ बच्चे जापानी बुखार के कारण मौत का शिकार बनते हैं, जबकि हकीकत कुछ ओर है। जापानी बुखार के प्रकोप का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पिछले तीन दशकों में इससे 50,000 से अधिक जानें जा चुकी हैं। उस पर भी इस बीमारी से लकवाग्रस्त हुए लोगों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता है।  

कैसे फैलता है जापानी बुखार

सुअर इस बीमारी का मुख्य वाहक होते हैं। सूअर के ही शरीर में इस बीमारी के वायरस पनपते और फलते-फूलते हैं। फिर मच्छरों द्वारा यह वायरस सुअर से मानव शरीर में पहुंच जाता है। चावल के खेतों में पनपने वाले मच्छर जापानी बुखार के वायरस से संक्रमित होते हैं। जापानी बुखार के वायरस का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं होता है। केवल पालतू सूअर और जंगली पक्षी ही जापानी एनसेफेलिटिस वायरस को फैला सकते हैं।                          

कब फैलता है जापानी बुखार                                        
अगस्त, सितम्बर और अक्टूबर के महीनों में यह अपने जोरों पर होता है। ये बीमारी हर साल इन्ही तीन महीनो में अधिक फैलती है। इसका शिकार बच्चे ज्यादा होते हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति के मस्तिष्क के अंदर पेरेनकाइमा में सूजन आ जाती है, जिससे ब्रेनस्टेम और थैलमा को नुक़सान होता है। इससे व्यक्ति कोमा में जा सकता है या उसका कोई अंग काम करना बंद कर सकता है, जिससे मृत्यु भी हो सकती है।                                               

जापानी बुखार के लक्षण और जांच
तेज़ बुखार, सिर दर्द, लाल आंखें, थकान, चिड़चिड़ापन, मुंह से झाग निकलना, झटके लगना, बेहोशी, सांस लेने में दिक्कत, दांत बंध जाना, आंखें चढ़ जाना, हाथों पैरों में अकड़न आदि मस्तिष्क ज्वर के लक्षण हैं। दिमाग़ी बुखार की पुष्टि के लिए ख़ून की जांच और सीएसएफ़ की जांच की जाती है। ब्रेन का सीटी स्कैन कराना बहुत आवश्यक है।
कैसे करें बचाव                                                           इस बीमारी से बचने के लिए सबसे पहली बात हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे घरों के आस-पास गन्दा पानी न जमा होने पाए। बच्चों को गंदे पानी के संपर्क में आने से बचाना होगा। साथ ही मच्छरों से बचाव करने के लिए कही किसी गड्ढे, कूलर या बुराने बर्तन आदि में पानी एकत्र देखें तो उसे साफ करें। उसमे तुरंत कुछ बूंद मिट्टी का तेल या पेट्रोल डाल दें। ऐसा करने से मच्छरों के लार्वा मर जायेंगे। समय से टीकाकरण कराएं।
जापानी बुखार को रोकने के उपाय

अब समय आ गया है कि जापानी बुखार को रोकने के लिए सरकार को कमर कस लेनी चाहिए। इस बीमारी की गंभीरता को देखते हुए टीकाकरण, कीटाणुओं पर काबू, स्वच्छ पीने का पानी, साफ-सफाई, बच्चों को बेहतर खान-पान और प्रभावित होने वाले बच्चों का पुनर्वास आदि योजनाओं को चलाना होगा। जापानी बुखार के मरीजों को अकसर वेंटीलेटर पर रखने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में मरीजों को उन्हीं हॉस्पिटलों में भर्ती किया जाए, जहां वेंटीलेटर और दूसरे आधुनिक उपकरणों की व्यवस्था हो अन्यथा मरीज की जान जा सकती है।  

Friday, 11 August 2017

अब बदलेगा मुगल राजपुत इतिहास

अब बदलेगा मुगल राजपुत इतिहास


राजस्थान में इतिहास 360 डिग्री पर घूमता सा नज़र आ रहा है। हल्दीघाटी की लड़ाई को लेकर राजस्थान बोर्ड के स्कूल की किताबों में नये तथ्य सामने आये। महाराणा प्रताप को इतिहास में वो जगह नहीं मिली जो उन्हें मिलनी चाहिए थी, लेकिन अब राजस्थान सरकार ने महाराणा प्रताप का इतिहास में वो जगह दिला ही दी। चलिए आज आपको महाराणा प्रताप के इतिहास पर हो रहे विवाद के बारे में बताते है।   

अब इतिहास में पढ़ाया जाएगा           
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 10वी की सामाजिक विज्ञान की नई किताब को 2017-18 में छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। अब नई किताब जानकारी देगीं कि महाराणा प्रताप ने अकबर को 1576 में हल्दीघाटी की लड़ाई में हराया था अब तक इतिहास की किताबों में पढाया जाता रहा है कि उदयपुर के पास हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच युद्ध हुआ था, जिसमें अकबर ने जीत हासिल की थी।                                         

चन्द्रशेखर शर्मा के शोध के आधार पर परिवर्तन

फरवरी 2017 के करीब राजस्थान विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर और इतिहासकार डॉक्टर चन्द्रशेखर शर्मा ने एक शोध प्रस्तुत किया था जिसके मुताबिक 18 जून 1576 ई. को हल्दीघाटी युद्ध मेवाड़ तथा मुगलों के बीच हुआ था। युद्ध के परिणाम के बारे में तरह-तरह की बाते की जाती हैं लेकिन असल में इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने जीत हासिल की थी। डॉ. शर्मा ने विजय को दर्शाते प्रमाण राजस्थान विश्वविद्यालय में जमा कराए दे थे। फरवरी 2017 में वसुंधरा राजे सरकार के तीन मंत्रियों ने उस प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिसके तहत इतिहास के तथ्य बदलने की बात की गई थी।

माहाराणा प्रताप के विजयी होने के प्रमाण                                   
चंद्रशेखर शर्मा का दावा है कि ऐसे कई तथ्य हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि लड़ाई के नतीजे महाराणा प्रताप, मेवाड़ के राजपूत राजा के पक्ष में रहे। अकबर का उद्देश्य महाराणा प्रताप को जिंदा पकड़ना था और दूसरे वो मेवाड़ को मुगल साम्राज्य में मिलाना चाहता था और दोनों ही उद्देश्यों में वो विफल रहा। इससे साबित होता है कि अकबर की विजय नहीं होती है। अकबर की मानसिंह और आसिफ खां के प्रति नाराजगी थी जिसमें उनकी ड्योढ़ी बंद कर दी गई थी। मुगलों का मेवाड़ की सेना का पीछा न करना। ये ऐसे परिदृष्य हैं जो हल्दीघाटी का परिणाम प्रताप के पक्ष में लाकर खड़ा कर देते हैं।

राजस्थान विश्वविधालय के इतिहास विभाग ने भी किया बदलाव

सिर्फ स्कूल ही नहीं बल्कि राजस्थान यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग ने भी कुछ बदलाव किए हैं। विभाग ने इतिहास के दो सेक्शनों के नाम में बदलाव किए हैं। विभाग ने प्राचीन इतिहास” (600 BC- 1200AD) का नाम बदलकर गोल्डन एरा ऑफ इंडियानाम दिया है और मध्यकालीन इतिहास” (1200 AD- 1700AD) का नाम को बदलकर स्ट्रग्लिंग इंडियाका नाम दिया है।